ये है शिव तांडव स्तोत्र की पौराणिक महत्त्व, पढ़े रावण ने क्यों की थी इसकी रचना ?

यू तो रामायण का इतिहास सब जानते ही है और रावण के चरित्र से भी सब परिचित है ! पर क्या आप जानते है कि रावण एक ऋषि पुत्र थे जिस कारण वो बहुत ज्यादा विद्वान थे ! भले ही रावण राकक्ष कुल में जन्मे पर वो थे तो एक ऋषि पुत्र इसलिए शायद वो शिव के भक्त भी थे ! साथ ही विद्वान् होने के कारण रावण ने रावण संहिता और शिव तांडव स्तोत्र सहित अनेक ग्रंथो की रचना भी की थी। आज हम आपको रावण द्वारा रचित शिव तांडव स्तोत्र के बारे में भी बताएँगे, जिसकी रचना उन्होंने शिवजी को प्रसन्न करने के लिए की थी। रावण की बुराईयों के बारे में तो सब जानते है पर उनके इस गुणों के बारे में बहुत कम जानते होंगे ! तो चलिए हम आपको बताते है कि यदि रावण ने अहंकार न दिखाया होता तो आज उनका नाम भी शायद विद्वानों में होता ! इसे पढ़ कर आप खुद ये बात मानेगे !

कथा….इसका आरम्भ कुछ यू हुआ कि एक बार रावण ने अपनी शक्ति के अहंकार में शिवजी के कैलाश पर्वत को ही उठा लिया था। उस समय भोलेनाथ ने मात्र अपने पैर के अंगूठे से ही कैलाश पर्वत का भार बढ़ा दिया और रावण उसे अधिक समय तक उठा नहीं सका। इस दौरान रावण का हाथ पर्वत के नीचे फंस गया। बहुत प्रयत्न के बाद भी रावण अपना हाथ वहां से नहीं निकाल सका। तब रावण ने शिवजी को प्रसन्न करने के लिए उसी समय शिव तांडव स्रोत रच दिया। शिवजी इस स्रोत से बहुत प्रसन्न हो गए। और इस तरह से रावण द्वारा ही शिव तांडव स्तोत्र की रचना हुई ! आईये हम आपको बताते है इसकी रचना की कुछ विशेष पंक्तियाँ !
॥ अथ रावण कृत शिव तांडव स्तोत्र ॥
जटाटवीग लज्जलप्रवाहपावितस्थले
गलेऽवलम्ब्यलम्बितां भुजंगतुंगमालिकाम्‌।

डमड्डमड्डमड्डम न्निनादवड्डमर्वयं
अगर सरल शब्दो में इसका अर्थ समझाया जाए तो ये है कि सघन जटामंडल रूप वन से प्रवाहित होकर श्री गंगाजी की धाराएँ जिन शिवजी के पवित्र कंठ प्रदेश को प्रक्षालित करती हैं, और जिनके गले में लंबे-लंबे बड़े-बड़े सर्पों की मालाएँ लटक रही हैं तथा जो शिवजी डमरू को डम-डम बजाकर प्रचंड तांडव नृत्य करते हैं, वे शिवजी हमारा कल्याण करें।

इसके दूसरे चरण की रचना कुछ इस प्रकार है कि..
जटा कटा हसंभ्रम भ्रमन्निलिंपनिर्झरी ।
विलोलवी चिवल्लरी विराजमानमूर्धनि ।

धगद्धगद्ध गज्ज्वलल्ललाट पट्टपावके
इसका अर्थ ये होता है कि अति अम्भीर कटाहरूप जटाओं में अतिवेग से विलासपूर्वक भ्रमण करती हुई देवनदी गंगाजी की चंचल लहरें जिन शिवजी के शीश पर लहरा रही हैं तथा जिनके मस्तक में अग्नि की प्रचंड ज्वालाएँ धधक कर प्रज्वलित हो रही हैं, ऐसे बाल चंद्रमा से विभूषित मस्तक वाले शिवजी में मेरा अनुराग (प्रेम) प्रतिक्षण बढ़ता रहे।

इसके तीसरे चरण में ..
धरा धरेंद्र नंदिनी विलास बंधुवंधुर-
स्फुरदृगंत संतति प्रमोद मानमानसे ।

कृपाकटा क्षधारणी निरुद्धदुर्धरापदि
अर्थात ..पर्वतराजसुता के विलासमय रमणीय कटाक्षों से परम आनंदित चित्त वाले (माहेश्वर) तथा जिनकी कृपादृष्टि से भक्तों की बड़ी से बड़ी विपत्तियाँ दूर हो जाती हैं, ऐसे (दिशा ही हैं वस्त्र जिसके) दिगम्बर शिवजी की आराधना में मेरा चित्त कब आनंदित होगा।

चौथे चरण का विश्लेषण कुछ इस तरह है ..

जटा भुजं गपिंगल स्फुरत्फणामणिप्रभा-
कदंबकुंकुम द्रवप्रलिप्त दिग्वधूमुखे ।

मदांध सिंधु रस्फुरत्वगुत्तरीयमेदुरे
मनो विनोदद्भुतं बिंभर्तु भूतभर्तरि ॥4॥
इसका अर्थ ये है कि ..जटाओं में लिपटे सर्प के फण के मणियों के प्रकाशमान पीले प्रभा-समूह रूप केसर कांति से दिशा बंधुओं के मुखमंडल को चमकाने वाले, मतवाले, गजासुर के चर्मरूप उपरने से विभूषित, प्राणियों की रक्षा करने वाले शिवजी में मेरा मन विनोद को प्राप्त हो।

पांचवा चरण कुछ इस प्रकार है ..

सहस्र लोचन प्रभृत्य शेषलेखशेखर-
प्रसून धूलिधोरणी विधूसरांघ्रिपीठभूः ।

भुजंगराज मालया निबद्धजाटजूटकः
इसका अर्थ है..इंद्रादि समस्त देवताओं के सिर से सुसज्जित पुष्पों की धूलिराशि से धूसरित पादपृष्ठ वाले सर्पराजों की मालाओं से विभूषित जटा वाले प्रभु हमें चिरकाल के लिए सम्पदा दें।

छठा चरण..

ललाट चत्वरज्वलद्धनंजयस्फुरिगभा-
निपीतपंचसायकं निमन्निलिंपनायम्‌ ।

सुधा मयुख लेखया विराजमानशेखरं
इन पंक्तियों का अर्थ है कि इंद्रादि देवताओं का गर्व नाश करते हुए जिन शिवजी ने अपने विशाल मस्तक की अग्नि ज्वाला से कामदेव को भस्म कर दिया, वे अमृत किरणों वाले चंद्रमा की कांति तथा गंगाजी से सुशोभित जटा वाले, तेज रूप नर मुंडधारी शिवजी हमको अक्षय सम्पत्ति दें !

सातवा चरण..

कराल भाल पट्टिकाधगद्धगद्धगज्ज्वल-
द्धनंजया धरीकृतप्रचंडपंचसायके ।

धराधरेंद्र नंदिनी कुचाग्रचित्रपत्रक-
इसकी परिभाषा है ..जलती हुई अपने मस्तक की भयंकर ज्वाला से प्रचंड कामदेव को भस्म करने वाले तथा पर्वत राजसुता के स्तन के अग्रभाग पर विविध भांति की चित्रकारी करने में अति चतुर त्रिलोचन में मेरी प्रीति अटल हो।

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2 comments

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