शास्त्र अनुसार ये होती है दरिद्रता की मुख्य वजह …

सभी प्रमुख धर्मों में दान की महत्ता को स्वीकार करते हुए अपने जीवन में स्वयं की आमदनी से सामर्थ्यानुसार कुछ हिस्सा जरूरतमंदों को देने के लिए प्रेरित किया गया है, किंतु विश्व की प्रथम संस्कृति के रूप में मान्य भारतीय संस्कृति ने तो दान को मानव मात्र के लिए अनिवार्य आचरणीय कृत्य मानते हुए इसे नैत्यिक कर्म की श्रेणी में सम्मिलित किया है।

‘सौ हाथों से धन अर्जित करो और हजार हाथों से उसका दान करो’– कहकर वेद ने दान के महत्व को जनमानस के समक्ष प्रस्तुत किया है।

‘शतहस्त समाहर सहस्रहस्त सं किर।’ (अथर्ववेद 3/24/5)

भारतीय संस्कृति में दातव्यता की गौरवशाली परंपरा अनादिकाल से ही चली आ रही है। सनातन धर्म जिन महत्वपूर्ण स्तंभों पर अविचल खड़ा है, उनमें ‘दानशीलता’ एक प्रमुख स्तंभ है। वैदिक ऋचाओं, उपनिषदों के पावन मंत्रों, पौराणिक ग्रंथों, श्रीमद् भागवद गीता, श्रीरामचरितमानस आदि शास्त्रों एवं संतों की वाणियों में दान के विषय में विस्तृत विवेचन मिलता है।

आदिशंकराचार्य जी ने दान को अन्नादि जीवनोपयोगी वस्तुओं का समाज में सम्यक विभाजन माना है। रामानुजाचार्य के अनुसार न्यायोपार्जित धन को सत्पात्र के प्रति देने का नाम दान है। वृंद कवि ने दीन व्यक्ति को दान दिए जाने की वकालत की है-

दान दीन को दीजिए, मिटे दरिद्र की पीर। औषध ताको दीजिए, जाके रोग शरीर।

श्रीमद्भागवदगीता में दान की विशद विवेचना की गई है। गीता के अनुसार फल की बिल्कुल भी इच्छा न रखकर प्रसन्नतापूर्वक अपनी शुद्ध कमाई का हिस्सा सत्पात्र को देने का नाम ‘दान’ है।  भविष्य पुराण में महाराज युधिष्ठिर द्वारा दान की महिमा के संबंध में पूछे जाने पर भगवान श्री कृष्ण कहते हैं, ‘‘महाराज! मृत्यु के उपरांत धनादि वैभव व्यक्ति के साथ नहीं जाते, व्यक्ति द्वारा सुपात्र को दिया गया दान ही परलोक में पाथेय बनकर उसके साथ जाता है। हृष्ट-पुष्ट बलवान शरीर पाने से भी कोई लाभ नहीं है, जब तक कि यह किसी का उपकार न करे।’’

उपकारहीन जीवन व्यर्थ है। इसलिए एक ग्रास से आधा अथवा उससे भी कम मात्रा में किसी चाहने वाले व्यक्ति को दान क्यों नहीं दिया जाता? इच्छानुसार धन कब और किसको प्राप्त हुआ या होगा? इसी भावना को अभिव्यक्ति प्रदान करते हुए किसी संत ने कहा है-

देह धरे का फल यही, देह देह कछु देह। देह खेह हो जाएगी, कौन कहेगा देह।।  

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