यह है भारत का प्राचीन वैदिक विज्ञान, आज के आधुनिक विज्ञान को देता है टक्कर

भारतीय संस्कृति के असली सुत्रधार वेद ही हैं। वेदों ने ही भारतीय संस्कृति का निर्माण किया है। वेदों में हमें राजनीति, धर्म, विज्ञान, अर्थशास्त्र, ज्योतिष और सांख्यिकी का पता चलता है। प्रचीन भारतीय हों या अभी के विद्वान सभी वेदो के अनुसंधान पर ही कार्य करते हैं। दुनिया के सबसे महान वैज्ञानिक न्युटन और आईंस्टीन भी वेदों के अध्ययन से ही बहुत कुछ जान पाये हैं। आज हम इस लेख में आपको प्रचीन वैदिक विज्ञान के बारे में बतायेंगे जो आज भी कायम है।

जिन सिद्धांतों का विश्व अंधविश्वास कहकर उपहास उड़ाता रहा उनकी पुष्टि आज का विज्ञान कर रहा है। उदाहरणतः जैसे तरंगों के माध्यम से संजय द्वारा महाभारत का वर्णन आज के मोबाइल फोन, टीवी इत्यादि ने समरूप कर दिया। ‘युग सहस्र योजन पर भानु, लील्यो ताही मधुर फल जानु’ एक कड़ी है हनुमान चालीसा की, इसमें सूर्य की पृथ्वी से दूरी की सटीक लंबाई वर्णित है:-

1 युग = 12000 साल
1 सहस्र = 1000
1 योजन = 8 मील
1 मील = 1.6 किमी
= 12000
×1000×8×1.6 = 15,36,00,000 किमी (नासा की भी लगभग यही गणना है)

रक्तबीज की बारंबार उत्पत्ति मानव क्लोनिंग की पहली घटना थी। 7 रंगों में सूर्य की रोशनी का विभाजन, पेड़-पौधों में भी जीवन होता है, अंग प्रत्यारोपण इत्यादि बाकी विश्व का मानव 19वीं शताब्दी में जान पाया। फोटॉन के भीतर हिग्स बोसॉन की उपस्थिति जानने के लिए संपूर्ण विश्व के वैज्ञानिक महामशीन पर महाप्रयोग कर रहे हैं।
लेकिन यहां के जंगली(गाँव के) कृष्ण ने तो उससे भी सूक्ष्म प्राण, प्राण से सूक्ष्मतम आत्मा और आत्मा की यात्रा परमात्मा तक को परिभाषित कर डाला था गीता में। जिस नैनो तकनीकी की तुम खोज करने जा रहे हो, भारतीय विज्ञान का आधार ही वही था।
अरे अभी तो विश्व को अपने भौतिक साधनों से हजारों साल और खोजें करनी हैं शिव के अध्यात्म को समझने के लिए कि कैसे उन्होंने बिना इलेक्ट्रॉन माइक्रोस्कोप के जान लिया था कि सूक्ष्मतम न्यूक्लियस के चारों ओर घेरा होता है जिसका इलेक्ट्रॉन चक्कर लगाते हैं। शिवलिंग में स्थित बिंदु और उसका घेरा इसका प्रमाण है।
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