जयंती विशेष -चार मठ स्‍थापित कर आदि गुरु शंकराचार्य ने फूंके थे सनातन धर्म में प्राण…

भारतीय प्राचीन परंपरा में आदि शंकराचार्य को शिव का अवतार माना जाता है। वे वेदांत के अद्वैत मत के प्रणेता थे। उन्‍होंने हिन्‍दू धर्म को फिर से प्राणवान बनाने और देश को एकसूत्र में पिरोने का महती कार्य किया।

उन्‍होंने कहा कि परमात्‍मा एक ही समय में सगुण और निर्गुण दोनों ही स्‍वरूपों में रहता है। उन्‍होंने वेदों के ज्ञान को पूरे भारतवर्ष में पहुंचाने का काम किया और इस तरह भारतीय संस्‍कृति के उत्‍कर्ष में अहम भूमिका निभाई।

आदिशंकराचार्य ने भारत के चारों कोनों में धार्मिक मठों की स्‍थापना की। उन्‍होंने दक्षिण के श्रृंगेरी में शंकराचार्य पीठ, जगन्‍नाथपुरी में गोवर्धनपीठ, पश्‍िचम द्वारका में शारदामठ और बद्रिकाश्रम में ज्‍योतिर्पीठ स्‍थापित किया। ये मठ भारत की एकात्‍मकता के परिचायक हैं।

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इन चारों मठों के लिए उन्‍होंने शंकराचार्य पद की स्‍थापना करके अपने चार प्रमुख शिष्‍यों को यहां आसीन किया। आदि शंकराचार्य आठ वर्ष की आयु में चारों वेदों में निष्‍णात हो गए थे, बारह वर्ष की आयु में पहुंचते हुए वे सभी शास्‍त्रों में पारंगत थे, चौदह वर्ष की उम्र में ब्रह्मसूत्र, गीता, उपनिषद पर भाष्‍य रचकर अल्‍पायु में उन्‍होंने संसार त्‍याग दिया।

अद्वैत मत के प्रवर्तक शंकराचार्य का दृष्टिकोण समन्‍वयवादी था। एक तरफ उन्‍होंने अद्वैत चिंतन को पुनर्जीवित किया, तो दूसरी तरफ उन्‍होंने जनसामान्‍य में प्रचलित मूर्तिपूजा का औचित्‍य भी सिद्ध करने का प्रयास किया। उनके अद्वैत दर्शन का सार है-

– ब्रह्म और जीव मूल रूप से और तत्‍व रूप से एक ही हैं। हमें इन दोनों के बीच जो अंतर दिखाई देता है वह हमारे अज्ञान की वजह से है।

– जीवन से मुक्ति के लिए ज्ञान आवश्‍यक है। उसके बिना मुक्ति नहीं। – जीव की मुक्ति ब्रह्म में लीन हो जाने में ही है। ब्रह्म ही अंतिम सत्‍य है।

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